भूतल का सबसे पावन क्षेत्र, जहां रखा है गणेश जी का कटा सिर…

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नई दिल्ली/दीक्षा शर्मा। देवभूमि उत्तराखंड खुद में कई रहस्यों को समेटे हुए है. उत्तराखंड में ऐसी कई जगहें है जो विज्ञान को भी हैरान और नतमस्तक कर देती है. हमारी दुनिया बहुत बड़ी है जहां तरह-तरह के अजीबो-गरीब रहस्य भरे पड़े हैं. कुछ को तो सुलझा लिया गया लेकिन सैकड़ों रहस्य आज भी रहस्य बने हुए हैं. जिन्हें सुलझाने की बहुत कोशिश की गई लेकिन आज तक कोई समाधान नहीं निकल पाया. आपने भी ऐसी कई रहस्मयी गुफाओं बारे में सुना होगा लेकिन आज हम आपको एक ऐसी गुफा के बारे में बताने जा रहे हैं. दरअसल, हम बात कर रहे है उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा जो भक्तों की आस्था का केंद्र है. यह गुफा विशालकाय पहाड़ी के करीब 90 फीट अंदर है. यह गुफा उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमांत कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है. पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है. यह भुवनेश्वर नाम के एक छोटे से गाँव में भगवान शिव की एक चूना पत्थर की गुफा है. भारत के प्राचीन धर्मग्रंथों में इस गुफा की महिमा गाई गई है. बताया जाता है कि इस गुफा में मौजूद पत्थर से पता लगाया जा सकता है कि दुनिया का अंत कब होगा. इस गुफा की खोज भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण ने की थी.

अनसुलझे रहस्य

गुफ़ा में प्रवेश करने के लिए रास्ता इतना छोटा है कि कभी कभी लोगों का निकलना मुश्किल हो जाता है . गुफ़ा के रास्ते का मुंह 3 फीट चौड़ा और 4 फीट लंबा बना हुआ है. मान्यता है कि जो यहां श्रद्धापूर्वक आता है, वहीं इसमें प्रवेश कर पाता है. अंदर जाते समय आपको इसकी दीवारों पर एक हंस की आकृति भी दिखाई देगी. लोगों का मानना है की यह ब्रह्मा जी का हंस है.

पुराण में लिखा गया है कि भगवान शिव ने गणेश का सिर इस गुफ़ा में उस समय धड़ से अलग किया था , जब उन्होंने शिव को माता पार्वती से नहीं मिलने दिया. कहा जाता है कि बाद में माता पार्वती के कहने पर भगवान गणेश का सिर इस गुफ़ा में लगाया. साथ ही इस गुफ़ा में दुनिया के अंत का भी रहस्य छुपा है. इस गुफा के अंदर जाने में कई कठिनाई आती है. इस गुफा के अंदर जाने पर कई अन्य गुफा और मिलती हैं. इस गुफा के अंदर काफी अंधेरा है लेकिन अब लाइट की व्यवस्था कर दी गई है.

इस गुफा के अंदर 180 सीढ़िया पार करने पर एक अलग ही नजारा दिखता है. गुफ़ा के अंदर जाते ही एक कमरा मिलता है, जिसमें करीब 33 हजार देवी देवता की मूर्तियां हैं, यहां पर बहता पानी भी मिलता है. बताया जाता है कि इस गुफा में सबसे पहले भगवान गणेश को पूजा जाता है.

इस गुफा में बने 4 द्वारों को पाप द्वार, रण द्वार, धर्म द्वार और मोक्ष के रूप में बनाया गया है, इस गुफा का पाप द्वार रावण की मृत्यु के बाद, रण द्वार महाभारत के बाद बंद हो गया था जबकि धर्म द्वार अभी भी खुला है।

पाताल भुवनेश्वर की गुफा में भगवान गणेश कटे ‍‍शिलारूपी मूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल के रूप की एक चट्टान है. इससे ब्रह्मकमल से पानी भगवान गणेश के शिलारूपी मस्तक पर दिव्य बूंद टपकती है. मुख्य बूंद आदिगणेश के मुख में गिरती हुई दिखाई देती है, मान्यता है कि यह ब्रह्मकमल भगवान शिव ने ही यहां स्थापित किया था.

इस गुफाओं में चारों युगों के प्रतीक रूप में चार पत्थर स्थापित हैं. इनमें से एक पत्थर जिसे कलियुग का प्रतीक माना जाता है, वह धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है. यह माना जाता है कि जिस दिन यह कलियुग का प्रतीक पत्थर दीवार से टकरा जायेगा उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा.

इस गुफा के अंदर केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के भी दर्शन होते हैं. बद्रीनाथ में बद्री पंचायत की शिलारूप मूर्तियां हैं . जिनमें यम-कुबेर, वरुण, लक्ष्मी, गणेश तथा गरूड़ शामिल हैं. तक्षक नाग की आकृति भी गुफा में बनी चट्टान में नजर आती है. इस पंचायत के ऊपर बाबा अमरनाथ की गुफा है तथा पत्थर की बड़ी-बड़ी जटाएं फैली हुई हैं, इसी गुफा में कालभैरव की जीभ के दर्शन होते हैं. इसके बारे में मान्यता है कि मनुष्य कालभैरव के मुंह से गर्भ में प्रवेश कर पूंछ तक पहुंच जाए तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है.

इस गुफा के अन्दर आपको मुड़ी गर्दन वाला गौड़ (हंस) एक कुण्ड के ऊपर बैठा दिखाई देता है . यह माना जाता है कि शिवजी ने इस कुण्ड को अपने नागों के पानी पीने के लिये बनाया था. इसकी देखरेख गरुड़ के हाथ में थी. लेकिन जब गरुड़ ने ही इस कुण्ड से पानी पीने की कोशिश की तो शिवजी ने गुस्से में उसकी गरदन मोड़ दी.

कैसे हुई इस मंदिर का खोज?

एक पुरानी मान्यताओं के अनुसार, पांडवों ने इस गुफा में तब ध्यान किया था जब वे अपने राज्य से सेवानिवृत्त हुए थे और अपनी अंतिम यात्रा पर थे. लंबे समय तक, पाताल भुवनेश्वर गुफा मानव जाति से छिपी रही, जब तक कि महान विद्वान, पुनरुत्थानवादी, दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य ने हिमालय में इस काल के दौरान अपनी गुफा नहीं पाई. यह वह था जिसने इस गुफा में शिव लिंगम को स्थापित किया था. गुफा 160 मीटर लंबी और 90 मीटर गहरी है. इसलिए, एक संकीर्ण प्रवेश बिंदु के माध्यम से गुफा के अंदर जाना एक काकवॉक नहीं है, आगंतुकों को सुरक्षित रूप से नीचे जाने के लिए लोहे की जंजीरों से समर्थन प्राप्त करना होगा.

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